यूरोप में 2030 तक कड़े जलवायु लक्ष्यों पर सहमति – DW – 11.12.2020
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यूरोप में 2030 तक कड़े जलवायु लक्ष्यों पर सहमति

११ दिसम्बर २०२०

यूरोपीय संघ के 27 देश 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 55 फीसदी घटाने पर राजी हुए. गुरुवार को शुरू हुआ सम्मेलन शुक्रवार तड़के थकान और ऊंघते ऊंघते संधि पर पहुंचा.

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यूरोप के कई देशों में जलवायु बचाने को लेकर अभियान तेजतस्वीर: picture-alliance/dpa/S. Hoppe

यूरोपीय संघ के देश 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 55 फीसदी कम करने सहमत हुए हैं. बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में गुरुवार को जलवायु लक्ष्यों पर हुई अहम बैठक शुक्रवार तड़के तक जारी रही. मैराथन बैठक के बाद जलवायु लक्ष्यों को लेकर संधि हुई. संधि के मुताबिक अगले 10 साल के भीतर जलवायु को गर्म कर रही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती करेंगे. हर सदस्य देश को ये लक्ष्य हासिल करने होंगे.

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जर्मन शहर कोलोन के पास कोयला ऊर्जा घरतस्वीर: Imago-Images/Action Pictures/P. Schatz

कार्बन न्यूट्रैलिटी का लक्ष्य

संघ 2050 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना चाहता है. नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन या कार्बन न्यूट्रैलिटी मतलब है कि जितनी सीओटू उत्सर्जित की जाएगी, उतनी ही सीओटू वातावरण से हटाई जाएगी. आसान भाषा में इसी संतुलन को कार्बन न्यूट्रैलिटी कहा जाता है.

संधि को बड़ी सफलता बताते हुए यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष और सम्मेलन के मेजबान चार्ल्स मिशेल ने ट्वीट किया, "यूरोप जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में लीडर है."

इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अर्थव्यवस्था के हर अहम सेक्टर को इको फ्रेंडली बनाना होगा. नए लक्ष्यों को लेकर खुशी जताते हुए यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फोन डेय लायन ने कहा, "चलिए हम सब खुद को 2050 तक क्लाइमेट न्यूट्रैलिटी के साफ रास्ते पर लाते हैं."

इस संधि से यूरोपीय संघ जलवायु परिवर्तन को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच का नेतृत्व भी कर सकेगा. शनिवार को संयुक्त राष्ट्र के वर्चुअल सम्मेलन में यूरोपीय संघ दुनिया के बाकी देशों के सामने अपने लक्ष्य रखेगा. वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि अगर जलवायु परिवर्तन के घातक नतीजों को रोकना है तो ऐसा करना ही होगा.

कार्बन क्रेडिट्स क्या है

कितनी मुश्किल से हुई संधि

पश्चिमी यूरोप और उत्तरी यूरोप के देश ज्यादा कड़े जलवायु लक्ष्यों की वकालत कर रहे थे. वहीं पूर्वी यूरोप के देश कुछ खास शर्तों की मांग कर रहे थे. पूर्वी यूरोप में पोलैंड और हंगरी जैसे देश अपनी ऊर्जा और आर्थिक जरूरतों के लिए बहुत हद तक कोयले पर निर्भर हैं. पोलैंड के रुख के कारण डील पर शुक्रवार सुबह तक बातचीत होती रही. पोलैंड ने ईयू से कहा कि वह गरीब देशों की फंडिंग की गारंटी तय करे.

पोलैंड ने कुछ क्षेत्रों में उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्यों को जीडीपी के अनुपात में तय करने की भी मांग की. इसका मतलब है कि छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश कम कटौती करेंगे. ज्यादातर देशों ने पोलैंड की इन मांगों का विरोध किया. ऐसी तकरार से गुजरते हुए संधि हो गई.

डील अब यूरोपीय संसद में जाएगी. यूरोपीय संसद की मंजूरी के बाद ही यह लागू होगी. इस डील को लागू करने के लिए अगले दस सालों में ऊर्जा क्षेत्र में 350 अरब यूरो का निवेश करना होगा.

ओएसजे/एके (रॉयटर्स, एएफपी)